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Tuesday, 5 September 2017

पितृ गुरु भवः

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बचपन से लेकर जवानी तक और जवानी से लेकर बुढ़ापे तक हम निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहते हैं. कुछ याद रखते हैं, कुछ पर अमल करते हैं, कुछ भूल जाते हैं. अपने बचपन में सीखी हुई एक बात आज जैसे मेरे जीवन का एक सत्याचरण बन गई है.
मैं आठ साल की थी. एक बड़ी बहन और एक बड़े भाई के बाद अपने माँ-बाप की तीसरी प्यारी संतान. जिनके बड़े बहन-भाई होते हैं उनकी एक अलग ही दादागिरी होती है. बात बात पर दोस्तों को डराना "भाई को बोल दूंगी न वो तुम्हे देख लेगा" या "बोल दूँ जाकर दीदी से?"
और बस कुछ इस वजह से बात बात पर रोने की आदत भी पड़ गई. कुछ भी परेशानी या बात होती तो रोने लगती और इसका जादू यह होता कि मम्मी, पापा, दीदी या भाई सब ठीक कर देते. बचपन में एक उपनाम मिल गया था मुझे. रोतलु. मगर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. बस मैं इतना समझ गई थी कि रोने से मेरा काम कहीं अटकता नहीं. मगर फिर एक दिन ...
मैं और मेरे अड़ोस-पड़ोस में रहने वाली मेरी सहेलियां सब स्कुल बस से नीचे उतर कर बस-स्टॉप पर खड़ी थी. मेरी एक सहेली के हाथों में एक चार्ट पेपर था. उसके जूते की डोरी खुल गई थी और उसने मुझे चार्ट पेपर थमाते हुए कहा "इसको ज़रा पकड़ो, मैं डोरी बांध लूँ". मैंने चार्ट पेपर तो पकड़ा मगर अब इसे मेरी बदकिस्मती कहिये या चार्ट पेपर की या मेरी सहेली की ... मेरे करीब से एक लड़की तेज़ी से चली और उसकी झपेट में चार्ट पेपर आया, फट गया. मेरी सहेली ने डोरी बाँध कर ऊपर मेरी तरफ और मेरे हाथों में उसका फटा चार्ट पेपर देख वह गुस्से में हो गई. "आज डाइग्राम बना कर कल टीचर को देना था. यह तुमने क्या किया?" मैंने सफाई देते हुए कहा "ज़बरदस्ती थोड़ी किया? और मुझसे थोड़ी फटा? फिर भी सॉरी". मगर मेरी सहेली ने अचानक से मुझे चाँटा मारा. मुझे एक दम से रोना आ गया. चांटे पर. सहेली ने मारा उस पर. और सबसे ज़्यादा इस बात पर कि मेरे दीदी या भाई भी मेरे साथ नहीं थे तब.
मैं रोती हुई घर गई और घर जैसे जैसे करीब आने लगा मेरे रुदन की आवाज़ बढ़ने लगी. घर पहुँचते ही स्कुल-बेग को रखते हुए पापा के पास गई और सुबक सुबक कर कहने लगी "पापा! मुझे वैशाली ने मारा!"
पापा किसी से फोन पर कुछ परेशानी से बात कर रहे थे मगर मुझे तो फिलहाल मेरी परेशानी ही नज़र आ रही थी. अपनी आवाज़ और रुदन की तीव्रता बढ़ाते हुए मैंने कहा "पापा! वैशाली ने बहुत ज़ोर से चाँटा मारा! मेरी तो कोई गलती भी नहीं थी". मगर फिर भी पापा का ध्यान उस अदृश्य व्यक्ति पर था जिनसे वे फोन पर बात कर रहे थे. यूँ अनदेखा-अनसुना हो जाने का दर्द अब चाँटे के दर्द से बढ़ने लगा. पापा ने फोन रखा और मैंने फिर से उच्चतर स्वर में कहा "पापा! मुझे वैशाली ने मारा!" पापा ने मेरी तरफ देख कर कहा "कहाँ मारा?" मैंने बायां गाल दिखाते हुए कहा "यहाँ". पापा ने बिन कुछ कहे मुझे दाहिने गाल पर चाँटा मारा. स्तब्ध. बिलकुल स्तब्ध हो गई मैं. रोना अचानक से बंद हो गया मेरा. और पापा ने कहा "वैशाली के पास दो हाथ हैं, उसने तुझे मारा. भगवान ने तुझे दो हाथ नहीं दिए हैं क्या? मेरी बेटी है तो जाकर उसे कस के तमाचा मार के आ वरना यहाँ आकर रोने की ज़रूरत नहीं".
अचानक मम्मी किचन से आई मुझे अपने साथ ले गई. कपडे बदल कर खाना खाते हुए मम्मी ने बड़े प्यार से समझाया "पापा की कोई पेमेंट रुकी हुई है. फिलहाल परेशां हैं. और फोन पर बात कर रहे थे न. तुम्हे समझाया है कि जब कोई फोन पर बात कर रहा होता है तब बीच में नहीं बोलते. चल मेरी अच्छी बच्ची". और माँ ने मेरे गाल चूम लिए. मरहम! ऐसा मरहम आजतक इस दुनिया में बना ही नहीं. मगर न जाने क्यों पापा की बात दिल में बैठ गई.
दूसरे दिन जब स्कुल-बस के लिए बस-स्टॉप पर खड़े थे तब वैशाली ने अपना चार्ट पेपर दिखाते हुए कहा "देख, तेरी बेवकूफी के बावजूद मैंने डाइग्राम पूरा किया". और मेरे दिमाग में पापा के शब्द चरखी की तरह घूमने लगे. घूमते घूमते वो शब्द मेरे हाथ तक पहुंचे और मैंने कस के वैशाली को चाँटा मारा. वो चौंक गई और उसकी आँखों में आँसू आ गए. "मैंने कहा था न कल कि जान-बुझ कर नहीं किया. माफ़ी भी मांगी थी न? अब बात ख़तम करो".
स्कुल-बस आ गई और हम सब अंदर चढ़ गए. आज पता नहीं क्यों ... हाथों में जैसे पर आ गए हो. बहुत खुश थी. और बस आठ साल की उम्र में मिली वो सीख आज तक नहीं भूली. जब तक आप खुद के लिए नहीं लड़ सकते, लोग आपको सताते और दबाते रहेंगे. इससे भी महत्वपूर्ण - जितना आप खुद के लिए लड़ सकते हैं उतना कोई ओर व्यक्ति आपके लिए नहीं लड़ सकता. एक व्यक्ति ढाल भी बन सकता है और तलवार भी. जो खुद के लिए लड़ सकता है वो ओरों के लिए भी लड़ सकता है, उनकी रक्षा कर सकता है. अपने जीवन के इस अमूल्य बोध-पाठ के लिए मैं अपने गुरु सामान पापा की सदा आभारी रहूँगी.
वापस घर पहुँच कर मैं मुस्कुराते हुए पापा के पास गई और उनका मिज़ाज देखा. वे शांति से कुछ पढ़ रहे थे. मैंने बड़े मीठे स्वर में कहा "पापा, पता है आज न मैंने उस वैशाली को कस के तमाचा मारा!" और यह कहते हुए मानो जैसे मैं कोई दौड़ में अव्वल आई हूँ वैसे ख़ुशी मेहसूस हुई.

अलबत्ता मैंने अपने जीवन में ऐसा भाव सबसे पहली बार अपने पापा के चेहरे पर देखा - हँसे या डाँटे?

Sunday, 11 September 2016

सुप्रीम कोर्ट - 5

हम दोनों फिर से पापा की ऑफिस में गए. पापा एक कागज़ पर कुछ गुना-भाग कर रहे थे. उनके पास अगर केल्क्युलेटर होता तो यह काम शायद आसान होता. मैं अपनी अंग्रेज़ी की किताब हाथ में लिए पापा के पास गई और कहा "पापा, यह देखिये मैंने 'Our Environment (हमारा पर्यावरण)' पर निबंध लिखा जो मेडम को इतना पसंद कि उन्होंने मुझे ३ स्टार दिए". यह कह कर पापा के हाथों में मैंने अपनी किताब थमा दी. वे चाहे कितने भी व्यस्त होते, हम बच्चों की यह कोशिशें और प्राप्तियों को सराहते और प्रोत्साहन देते. पापा वह निबंध पढ़ने लगे. दीदी चुपके से ऑफिस में आई और कोने में पड़े छोटे मेज़ के पास गई. उस मेज़ पर पड़े दो तीन दिन पुराने अख़बार को उठा कर हलके से केल्क्युलेटर उनके नीचे सरका दिया. फिर वह पापा के पास आई और कहा "पापा मुझे स्कूल के एक प्रोजेक्ट के लिए कुछ अख़बार चाहिए. मैं ले सकती हूँ?" पापा ने हाँ में सिर हिलाया. दीदी वापिस उस मेज़ के पास गई और अख़बार को उठाया और ख़ुशी से बोली "पापा! देखिये केल्क्युलेटर मिल गया!" और पापा के पास उससे ले आई. पापा बड़े आश्चर्य से देख रहे थे. सोच रहे थे कि जब उन्होंने तीन-चार बार वहां देखा तब तो केल्क्युलेटर वहाँ नहीं था. और अब? वे हम दोनों को बड़े अजीब से देख रहे थे. शायद उन्हें यकीन नहीं हो रहा होगा कि हमने उनकी इतनी बड़ी मदद कर दी. फिर वह मुस्कुराये और कहा "थैंक यू प्रियंका बेटा, तुम दोनों सचमुच कमाल हो". दीदी और मैं बहुत खुश हुए कि दीदी का आईडिया कामयाब रहा और पापा की तारीफ़ भी सुनने मिली. तपती ज़मीन पर आखिर हमने ठंडा पानी छिड़क ही दिया. पापा हमें देख कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे. 
"आप खुश हैं न पापा?" दीदी ने पूछा. 
"हाँ प्रियंका, मैं खुश हूँ".
अब यह सही समय था फैसला करवाने के लिए.
"अच्छा, अब आप सुनिये इस ईशा ने क्या किया. मुझसे पूछे बिना मेरी कलर पेंसिल्स ली और बॉक्स भी तोड़ दिया."
"नहीं पापा, दीदी झूठ बोल रही है. मम्मी ने कहा था कि मैं दीदी की पेंसिल्स ले सकती हूँ. और बॉक्स छीना झपटी में टूटा. दीदी ने तो मेरी ड्रॉईंग ही खराब कर दी". फिर दीदी को देखते हुए मैंने कहा "मैं वैसे भी तेरी पेंसिल्स खा नहीं जाती". 
"देखा पापा यह कैसे आड़े-टेढ़े जवाब देती है, ज़ुबान लड़ाती है. आप इससे समझाए कि ऐसा नहीं करना चाहिए. मैं आखिर उसकी बड़ी दीदी हूँ". 
"पापा आप दीदी से कहिए कि हमेशा मुझ पर ऐसे दादागिरी न करे". 
"पापा, ईशा पूछे बिना ... "
ऑफिस हम बहनों की दलीलों के कोलाहल से गूँज रहा था.

हमारे प्यारे सुप्रीम कोर्ट हमें बड़े प्यार से देख कर अभी भी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. 

Saturday, 10 September 2016

सुप्रीम कोर्ट - 4

अब पापा की ऑफिस के अलावा मेरा और दीदी का कमरा बाकी रह गया था. पापा तो खैर ऑफिस में ढूंढ ही रहे थे. दीदी और में अपने कमरे में गए. बेड पर देखा, ड्रॉवर में देखा. कबर्ड में देखा. "ईशा, तूने आज अपना मेथ्स का होमवर्क कर लिया?"
दीदी का यह सवाल बड़ा महत्वपूर्ण था. मुझे शब्दों से प्यार था, उनसे खेलना अच्छा लगता था. ड्रॉइंग करना, चित्र बनाना उन्हें रंगना पसंद था. पर मेथ्स से तो मेरा छत्तीस का आंकड़ा था. दीदी और संजू समझाते रहते की मेथ्स में नियमितता थी. मगर फिर भी मुझे एक आँख न भाता. भगवन भला करे उस इंसान का जिसने केल्क्युलेटर बनाया. मुझ जैसों के लिए एक वरदान यंत्र था. केल्क्युलेटर न होता तो मेरे मेथ्स का होमवर्क आधे घंटा की जगह एक घंटा चलता. फिर मुझे न खेलना का, न पैंटिंग का और न किताबें पढ़ने का पर्याप्त समय मिलता. अपनी मनपसंद शौक पुरे करने के लिए एक एक मिनट कीमती रहता है. हाँ, अब आप समझे दीदी का यह सवाल क्यों महत्वपूर्ण था. मैंने अपनी किताबों की शेल्फ में ढूँढा. केल्क्युलेटर वहां भी नहीं था.
"ईशा, ऐसा तो नहीं की भूल से तूने केल्क्युलेटर अपनी किताबों के साथ स्कूल बेग में रख दिया हो?"
"मैं ऐसा क्यों करुँगी?"
"देख तो ले". मगर यह कहते हुए दीदी खुद मेरी स्कूल बेग चेक करने लगी. और मेथ्स की किताबों के बीच वह छुपा रुस्तम मिला! हम दोनों इतने खुश हो गए!
"चल पापा को दे आते हैं!"
"रुक ईशा, पापा से क्या कहेंगे? कहाँ से मिला केल्क्युलेटर?"
मैं बर्फ सी जम गई. पापा ने मुझे मेथ्स के होमवर्क के लिए केल्क्युलेटर का उपयोग करने से सख्त मना किया हुआ था. पता नहीं उन्हें ऐसा लगता था कि प्रारंभिक मेथ्स के लिए कैलकुलेटर नहीं पर दिमाग का उपयोग करना चाहिए. दो महीने पहले उन्होंने मुझे केल्क्युलेटर द्वारा मेथ्स का होमवर्क करते देख लिया था. उनकी डांट याद आई और मैं रोने लगी.
"दीदी! पापा मुझे बहुत डांटेंगे! दीदी ... "
"रो मत. कुछ सोचते हैं. दीदी ने हलके से मेरे सर पर एक थपकी मारी. "सोचने दे". दो महीने पहले की डांट इस कदर कानो में गूंजने लगी थी की मैं सोच नहीं रही थी, मैं रो रही थी.

"ईशा, रो मत. देख मेरे पास एक मस्त आईडिया है!" 



( ... to be continued)

Friday, 9 September 2016

सुप्रीम कोर्ट -3

बम फटा! भूचाल आया! बिजली गिरी! पापा की एक दहाड़ इतना असर रखती थी. दीदी और मैं सुन्न से खड़े रह गए. "दोनों मक्खियों की तरह कब से भिन्न-भिन्ना रही हो. एक तो मुझे मेरा केल्क्युलेटर कहीं भी मिल नहीं रहा! काम अटका पड़ा है. कल सुबह तक यह डिज़ाइन दिखानी है. और तुम दोनों मेरे सिर पर नाच रही हो. जाओ यहाँ से!"
मैं और दीदी पापा को और एक दूसरे को देख रहे थे.
"अभी तक यहीं खड़ी हो? जाओ!" यह कह कर पापा मुड़ गए, केल्क्युलेटर ढूंढने लगे. दीदी और मैं सहमे हुए चुपचाप बाहर आ गए. समझ में नही आ रहा था कि पापा इतना गुस्से में क्यों हो गए. हम ने तो सिर्फ उनसे केस सुलझाने को कहा था. पापा का गुस्सा हमसे बर्दाश्त ही नहीं होता. उनका स्नेह हमें तपती धुप में घने छाँव सा महसूस होता, वहीँ उनका गुस्सा तपती हुई ज़मीन पर पैर रखने जैसा लगता. तपती ज़मीन पर ठंडा पानी डालने की ज़रुरत थी. "पापा गुस्से में हैं", मैंने अपनी आवाज़ ढूंढते हुए कहा. दीदी मेरे सामने ऐसे देख रही थी मानो अभी बोलेगी "मैं अंधी नहीं हूँ." मगर दीदी ने ऐसा कुछ कहा नहीं. दो पल के लिए हम दोनों चुप खड़ी थीं. सोच रही थीं कि क्या करें कि जिससे पापा का गुस्सा कम हो जाए.
"पापा को केल्क्युलेटर नहीं मिल रहा, अगर मिल जाए तो ..."
"चलो ढूंढते हैं."
"मगर दीदी, ऑफिस में तो पापा हैं."
"तो बाकी घर में ढूंढते हैं".
हम दोनों पापा मम्मी के कमरे में गए. पापा कई बार शेर-बाज़ार को लेकर उनके निवेश का हिसाब करते तब केल्क्युलेटर अक्सर यहाँ ले आते. मैंने बेड के नीचे देखा. दीदी ने ड्रॉवर में देखा. केल्क्युलेटर कहीं नहीं मिला.
फिर हम संजय के कमरे में गए. वह फुटबॉल प्रैक्टिस के लिए गए था. उसका कमरा हमेशा बिखरा पड़ा रहता. हम बहनों से साफ़ करवाता. बड़े भाई होने की दादागिरी. हम दो बहनें संजू से बेहतर जानती थी कि उसकी चीज़ें कहाँ पड़ी हैं. उसका कमरा साफ़ करने के लिए हमें वेतन में उसकी विडियो गेम्स खेलने मिलती. हम दोनों ढूंढने लगी पर केल्क्युलेटर यहाँ भी नहीं मिला. अब?



(... to be continued)

Thursday, 8 September 2016

सुप्रीम कोर्ट - 2

पापा. मेरे प्यारे पापा. अपने सारे बच्चों को एक समान प्यार करने वाले और कभी भी पक्षपात न करने वाले मेरे पापा. हम भाई बहनों की लड़ाई जब भी होती, और बहुत होती थी, तब पापा इस तरीके से बात को सुलझा देते थे कि हम में से कोई यह नहीं कह पाता कि "पापा जब देखो तब तेरी ही तरफदारी करते हैं."  घर के सारे फैसलों पर भी उनकी मोहर लग जाती तो वह आखरी फैसला माना जाता. इन्ही न्याय-प्रिय पापा को हमने घर में सुप्रीम कोर्ट का दर्जा दे रखा था. जो बातें हाई कोर्ट से न सुलझ पाती (वे घर के कामों में व्यस्त जो रहती), वह सुप्रीम कोर्ट सुलझा देते.
पापा ने घर के एक कमरे में अपनी ऑफिस बनाई हुई थी. हम दोनों बहनें अपना केस लिए उनकी ऑफिस में गई. सबूत के तौर पर टूटा पेंसिल बॉक्स, दीदी द्वारा बिगाड़ी हुई मेरी ड्राइंग और कलर पेंसिल्स हाथ में थे.
"पापा, देखिये ईशा ने क्या किया! मुझसे पूछे बिना मेरी कलर पेंसिल्स भी ली और बॉक्स भी तोड़ दिया. चोर!"
"ना पापा, मम्मी ने कहा था कि मौसी ने हम दोनों को जो गिफ्ट्स दी है वह हम आपस में बाँट सकते हैं. बिना पूछे."
"झूठी! मम्मी ने ऐसा नहीं कहा था कि हम बिना पूछे एक दूसरे की चीज़ें ले सकते हैं."
"पापा, दीदी ने मेरी ड्राइंग खराब कर दी". मैं ज़ोर ज़बरदस्ती से अपनी आँखों में आंसू लाने की कोशिश कर रही थी. फिलहाल सिर्फ रोती हुई आवाज़ ही बना सकी.
"पापा, ईशा ने मेरा पेंसिल बॉक्स तोड़ दिया!"
"पापा मैंने जान बुझ कर नहीं तोडा. दीदी छीना-झपटी कर रही थी सो टूट गया. ड्रामा क्वीन!"
"तू झूठी! चोर!"
"पापा, पेंसिल बॉक्स गलती से टूटा मगर दीदी ने जानबूझ कर मेरी ड्राइंग ख़राब की. देखिये यह ब्लू लाइन्स कर दी." मेरी आवाज़ कुछ और ज़्यादा रोतली हो गई.
"पापा, ईशा हमेशा ऐसा करती है. उस दिन बिना पूछे मेरी रिबन ले ली".
"तेरी रिबन तो ज़मीन पर गिरी पड़ी थी. तेरी बाकी साड़ी चीज़ों कि तरह. तू कहाँ अपनी चीज़ें संभाल कर रखती है? आलसी!"
"मैं आलसी नहीं, तू चोर है!"
"तू झूठी है!"
"तू झूठी! तेरी सारी बातें झूठी!"
"तू आलसी ..."

"चुप! बिलकुल चुप! खबरदार दोनों में से किसी ने एक और शब्द भी बोला या आवाज़ निकाली तो!" सुप्रीम कोर्ट ने दहाड़ लगाई.


(... to be continued)

Wednesday, 7 September 2016

सुप्रीम कोर्ट - 1

पेड़ के पत्ते हरे रखूं या लाल? पतझड़ या ... हाथों में हरे रंग की कलर पेंसिल लिए सोच रही थी कि कागज़ पर बनाये हुए मेरे उस पेड़ को कौन सा रंग दूँ ... कि दीदी आ गई.
"मुझसे पूछे बिना मेरे कलर पेंसिल को छुआ कैसे? चोर!" यह कह कर उसने मेरे हाथों से पेंसिल छीन ली.
"तुमने ही तो कहा था कि हम दोनों एक दूसरे की गिफ़्ट अदल-बदल कर सकते हैं. मेरी नैलपोलिश तुम ले सकती हो और तुम्हारे कलर पेंसिल्स मैं!"
"मगर पूछ कर लेना चाहिए न."
"तो क्या हुआ? तुम भी मेरी नैलपोलिश मुझसे बिना पूछे ले सकती हो." दरअसल यह ज़रा मुश्किल होगा दीदी के लिए. मैंने अपनी नैलपोलिश छुपा जो दी थी. "मम्मी ने कहा है जो कुछ भी हम दोनों का है हमें आपस में बांटना है. न तेरा न मेरा. और अपनी चीज़ इस्तेमाल करने के लिए क्यों पूछना?" आठ साल की बच्ची की यह वकालत क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी पर सामने उसके उसकी बड़ी दीदी थी. जैसे सरकारी अफसर और बाबु अपने "बड़े' होने का एहसास जताते रहते हैं वैसे ही दुनिया के सारे बड़े भाई-बहन अपने बड़े होने का हक़ जताते रहते हैं. मानो कोई विशेष परीक्षा दे कर उन्हें ये उपाधि प्राप्त हुई हो. सभी भाई बहन. सिवाय मैं.
"मौसी ने यह पेंसिल्स मुझे दी थी पगली!" यह कहते हुए दीदी सारी पेंसिल्स इक्कठी करने लगी. मैं ज़रा सी रोने जैसी हो गई. मेरे पेड़ के पत्ते और घर की छत अभी भी बेरंग जो थे. मैंने उससे कलर पेंसिल्स छीनने की कोशिश की. बहनों की इस लड़ाई में पेंसिल बॉक्स को शहादत हासिल हुई. छीना-झपटी की वजह से पेंसिल बॉक्स का एक भाग मेरे हाथ में और दूसरा भाग दीदी के हाथ में था. और मासूम सी पेंसिल्स फर्श पर बिखरी पड़ी थी. ग्लानि भाव को आते अक्सर देर लगती है. गुस्सा तो बिजली सा तेज़ पहले पहुँच जाता है. मेरे 'सॉरी' सोचने से भी पहले दीदी ने गुस्से में आकर मेरे बनाये हुए चित्र पर नीले रंग की पेंसिल से लकीरें बना दी. माफ़ी मांगने का ख़याल आते आते रह गया और मुझ पर खून सवार हो गया. मैंने दीदी को धक्का मारा. वह ज़रा सी ही पीछे पड़ी मगर ऐसी आवाज़ें लगाई जैसे मैंने उससे गरम चिमटे से छुआ हो. "नौटंकी! मेरी ड्राइंग खराब कर दी!"
"चोर! मेरी पेंसिल चुराती है!"

बस! अब बात इस कदर आगे बढ़ चुकी थी की सीधे कोर्ट तक ही जानी थी. सो हम दो बहनें इन्साफ की गुहार लिए हाई कोर्ट पहुंची. किचन में जाकर देखा, हाई कोर्ट वहां नहीं थीं. याद आया, मंदिर जाने को कह रही थीं. अब? दीदी के ख़याल में यह सवाल भी आया होगा क्योंकि वह भी मेरे साथ सीधे सुप्रीम कोर्ट जा पहुँची. 


... (to be continued)

Sunday, 22 May 2016

जिस दिन ... - 4

- 4 -

नीरा! क्या खूब जोड़ी थी नीरा और हर्ष की! बिलकुल हर्ष की मम्मी की पसंद अनुसार. कैसे? नीरा के माँ-बाप बचपन में ही चल बसे थे और वह अपने मामा-मामी के घर ही बड़ी हुई थी. हर्ष की मम्मी का पसंद का तर्क कुछ इस तरह था कि अगर बहु का मायका ही नहीं होगा तो वह मायके जाने की बात ही नहीं करेगी. 
नीरा देखने में सुंदर थी और बड़ी समझदार भी थी. पर उसकी पढ़ाई पूरी न हो पाई थी. कॉलेज जाने का मौका ही नहीं मिला. आखिर अपने माँ-बाप जितना प्रोत्साहन कोई और देता है? उससे वैसे तो अपने ससुराल में सारे सुख मिल रहे थे ... नहीं मिल रहा था तो वह था सम्मान. हर्ष अक्सर अपने ही रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच में नीरा का मज़ाक उड़ाया करता रहता. एक दिन नीरा ने बड़े प्यार से हर्ष से कहा "आप को अगर मेरी कोई बात अच्छी नहीं लगती हो तो आप मुझे एकांत में बता दिया कीजिये. यूँ सबके सामने कहते हैं तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता है."
हर्ष ने उससे प्यार से बाहों में लेते हुए कहा "अरे पगली! मैं क्या कहता हूँ वह मत देख ... तुझसे कितना प्यार करता हूँ वह देख!"
मगर नीरा इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी. सोचा समय के साथ या तो हर्ष की आदत बदलेगी और या तो उससे ही यह सब सुनने की आदत पड़ जाएगी. मगर फिर हर्ष घर में भी आम बातों पर नीरा में नुक्स निकालता रहता. खामियां बताता रहता. इमरान यह बात जानता था मगर वह इससे मिया-बीवी की आपस की बात समझ कर कुछ नहीं कहता. यूँही कुछ और महीने बीते और अब तो हर्ष अपने दोस्तों के घर दावत पर जाता तो वहां भी बोल देता "भाभी, आप ही नीरा को खाना पकाना सिखा दीजिये. उससे तो खिचड़ी भी ढंग की नहीं बनती!"
एक रात ऐसी ही एक दावत से जब हर्ष और नीरा घर लौटे तो नीरा रो पड़ी. 
"हर वक़्त, हर जगह मुझे क्यों नीचा दिखाते रहते हैं?"
हर्ष गुस्से में बोला "तुम्हे तो मज़ाक लेना भी नहीं आता! मैं यूँही मज़ाक में बोलता रहता हूँ."
"मज़ाक कई और बातों का भी तो हो सकता है. कभी मेरे खाने पकाने को लेकर या कभी मेरे कपड़ों को लेकर ... एक हद होती है मज़ाक की. और आप वह हद बार बार पार करते रहते हैं हर्ष!"
"उफ़! कैसी औरत से पाला पड़ा है! तुम्हारी जगह किसी पढ़ी-लिखी लड़की के साथ शादी करता तो वह ..."
"मुझसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी होती तो आपका यह रवैया यह स्वाभाव एक महीने से ज़्यादा सहन ना करती."
"ज़रूर सहन करती. तुम्हारी जैसी तो कई मिल जाती. मज़ाक को मज़ाक समझ कर हस तो लेती!"
"और अगर मैं भी सबके सामने आपका इस कदर मज़ाक उड़ाती तो?"
यह सुनते ही हर्ष ने अपना हाथ तो उठाया पर वहीं रुक गया. वह एक औरत को कैसा मारता? और वह भी जब वह औरत उसकी पत्नी हो? उस एक पल में जैसे उसने अपनी हद नीरा को दिखा दी थी. और नीरा इस हद को एक शुरुआत समझ कर चौंक गई थी. हर्ष अपने कमरे में सोने चला गया. बात बढ़ाने से कोई फायदा नहीं था. 
अगले दिन सुबह हर्ष देर से उठा. रविवार जो था. आज उससे इमरान के साथ धवल के घर जाना था. नहाकर तैयार हो कर नीचे आया. नीरा कहीं नज़र नहीं आ रही थी. एक दो बार आवाज़ लगाई. फिर किचन में जाकर देखा. टेबल पर एक खत पड़ा था. खोला और पढ़ा.
'हर्ष, मैं जा रही हूँ. आपके साथ रह कर हर बार अपना अपमान सुन कर थक चुकी हूँ. आप मेरे साथ रह कर भी मुझ में कोई खूबी ना देख पाये, महीने में दो बार आने वाले मनोज जी मुझे खूब समझ पाए. शायद मैं आपके लायक नहीं हूँ. या शायद आप मेरे. शायद. आप हमेशा कहते थे कि आपको मुझसे अच्छी बीवी मिल सकती है. आशा करती हूँ आपकी खोज सफल रहे. - नीरा'
घर की घंटी बार बार बजी. हर्ष धीरे धीरे चल कर दरवाज़ा खोलने गया. इमरान था. "कितनी देर लगा दी? 3  मिनट से बेल बज रहा हूँ. भाभी घर पर नहीं?"
हर्ष अवाक् सा ... खत इमरान के हाथ में थमा कर सोफे पर बैठ गया. इमरान ने खत पढ़ा. वह जाकर हर्ष के पास बैठा. अब कैसा कहता कि ... 

Saturday, 21 May 2016

जिस दिन ... - 3

- 3 -

हर्ष अब अपने पापा की कॉटन मिल संभालता था. पढ़ाई तो पूरी हो चुकी थी पर वह तो उसके लिए एक औपचारिकता ही थी. उससे कहाँ औरों की तरह नौकरी करनी थी. अलबत्ता इस पढाई से यह फ़ायदा हुआ कि अब वह इस व्यवसायिक ज्ञान से अपने व्यापार को आगे बढ़ा सका और आधुनिकीकरण कर सका. साथ ही वह धन निवेश के लिए सस्ते दाम पर ज़मीन खरीदता और मुनाफा मिलने पर ज़मीन बेच देता. उसकी पहचान देसाई जी से हुई जो एक अनुभवी दलाल थे और जिन्होंने हर्ष के लिए एक से बढ़कर एक ऐसे सौदे तय किए थे.

देसाई जी की भी अपनी एक वजह थी कि वह हर्ष को इतने अच्छे सौदे दिलवाते - हर्ष सौदा करने में ज़्यादा समय बर्बाद नहीं करता और अपना निर्णय जल्द ही ले लेता. दूसरी वजह यह थी कि हर्ष चुकौती समय पर कर देता था. इन दो सालों में दोनों को एक दूसरे पर काफ़ी विश्वास बैठ गया था. और इसी विश्वास के चलते देसाई जी को हर्ष का नाम सुझा जब उनके पास एक बिल्डर का सौदा आया. इस बार वह खुद अपना पैसा निवेश करना चाहते थे. ज़मीन का वह टुकड़ा ऐसी जगह पर था जहाँ 4  साल में ही उसका भाव दुगने से ज़्यादा होने की संभावना थी. यह एक सुनहरा मौका था.19 लाख की रकम तो तैयार थी उनके पास मगर कहीं से भी बाकी 3 लाख रुपयों का बंदोबस्त नहीं कर पा रहे थे. औरों के लिए हज़ारों और लाखों का मुनाफा करवाने वाले देसाई जी अपने लिए भी कुछ अच्छी आशा लिए हर्ष की ऑफिस पहुँचे.
हर्ष अपनी मीटिंग खत्म करके ऑफिस में ही बैठा था और ... "आइए देसाई जी! कैसे हैं?"
"बस आप जैसों की दुआ और प्रभु की दया से सब कुशल मंगल है."
"कहिए, क्या लेंगे? चाय या ठंडा?"
"ठंडा ही मंगवा लीजिए. बाहर इतनी गर्मी है कि चाय पीने का मन ही नहीं करता."
हर्ष ने दो ग्लॉस शर्बत मंगवाए. "और सुनाइए. मार्केट बड़ा ठंडा है. कुछ है खरीदने को?"
"हाँ है. पर फिलहाल तो मैं खुद सोच रहा हूँ कि विकास प्रॉपर्टीज के नए प्रोजेक्ट में इन्वेस्ट करूँ. इस एक इन्वेस्टमेंट से मेरे निवृत जीवन में काफी आराम रहेगा. यूँ समझ लीजिए अच्छी खासी पूंजी जमा हो जाएगी. पर बस 3 लाख रूपये कम पड़ रहे हैं."
"कोई मुश्किल नहीं. आप बैंक से उधार ले लीजिए."
हर्ष के 'कोई मुश्किल नहीं' से देसाई जी की आशा जितनी बढ़ी थी वह उसके 'बैंक से उधार ले लीजिए' कहने पर कुछ डग नीचे आ गई.
"मैंने पहले से ही घर और गाड़ी के लिए उधार लिया हुआ है. नहीं, बैंक से लोन मुमकिन नहीं."
"ओह! तो अब क्या करेंगे?"
"मैं सोच रहा था कि अगर आप ही मुझे 3 लाख उधार दे देते. मैं व्याज के साथ आपको यह रकम १ साल में चूका दूंगा."
हर्ष सोच में पड़ गया - इस सोच में नहीं कि वह पैसे उधार दे या नहीं. मगर इस सोच में कि वह क्या बहाना दे कर मना करे. "देखिये देसाई जी, मेरे पापा और मम्मी सिंगापोर जाने वाले हैं, मेरी मौसी के यहाँ. अब रिटायर हो कर पहली बार जा रहे हैं तो खाली हाथ जायेंगे नहीं. टिकट, तोहफे और कई और खर्चे हो रहे हैं. इसलिए फिलहाल तो मेरे पास ३ लाख तो क्या, 50000 रूपये भी नहीं."
यह एक ऐसा सफ़ेद झूठ था जो देसाई जी जानते थे क्योंकि उन्होंने ने ही दो हफ्ते पहले एक सौदा करवाया था जिससे हर्ष को १० लाख का मुनाफा हुआ था. मगर वह यह भी समझ गए थे कि हर्ष उनकी मदद करना ही नहीं चाहता. शर्बत उनके गले से उतर नहीं रहा था ... गले में निराशा जो अटकी हुई थी. अब वहाँ बिना वजह बैठने का कोई फ़ायदा नहीं था. वे खड़े हुए और हर्ष से कहा "ठीक है फिर, तो मैं चलता हूँ."
हर्ष की निगाहें कंप्यूटर के स्क्रीन पर थी. उसने आँखें मिलाये बिना ही देसाई जी को कह दिया "ठीक है. फिर मिलेंगे."

देसाई जी बड़े मायूस होकर ऑफिस से निकले. रिश्तेदारों और दोस्तों से उधार ले कर उन्होंने १० लाख तो जमा किये थे मगर अब कोई ऐसा नहीं बचा था जिनसे वे पैसे मांग सके. औरों के लिए मुनाफा करवाने वाले देसाई जी ने आज अपने ही जीवन में निवेश और संबंध में घाटा महसूस किया. वह सौदा अब उनके हाथ से गया.

सालों से चल रही रोज़ की आदत - हर्ष और इमरान घर के बाहर पार्क पर मिले. इमरान घर में सिगरेट नहीं पीता था. और हर्ष को आदत थी रात के खाने के बाद पान खाने की. दोनों अपनी दिन दिनचर्या बता रहे थे. और हर्ष ने देसाई जी की बात कही. मगर इमरान की अभी भी वही राय थी "यह तुमने ठीक नहीं किया हर्ष. तुम्हारे लिए ३ लाख कौनसी बड़ी बात है. फिर ये तो सोचो उनकी वजह से अब तक तुम्हे शायद 80-90 लाख का मुनाफा हुआ होगा."
"अरे छोड़ न यार! आज 3  लाख मांगे, कल 5  और परसों 10 लाख मांगते. उनकी प्रॉब्लम है, मेरी नहीं."
"नहीं यार. हमें उन लोगों की कदर और मदद करनी चाहिए जो अपना नफा-नुक्सान देखे बिना हमारे लिए इतना कुछ करते हैं."
"अरे बाजार भरा पड़ा हुआ है देसाई जी जैसे दलालों से. वैसे भी मैं उनको वक़्त पर दलाली दे दिया करता हूँ."
"होंगे कई दलाल, पर देसाई जी जैसे नहीं. जिस दिन उन्हें कोई और कदर करने वाला मिल गया उस दिन वे हमारा साथ छोड़ देंगे. अच्छा यह बता इंदौर से उस लड़की के घरवालों का कुछ जवाब आया?"


(... to be continued)

Friday, 20 May 2016

जिस दिन ... 2

- 2- 

हर्ष के पापा की कॉटन मिल थी. अपने परिवार की हर सुख सुविधा का ख़याल रखने वाले वे एक अच्छे बेटे, अच्छे पति और एक अच्छे पिता थे. हर्ष अक्सर उनके साथ मिल और ऑफिस जाया करता. आखिर पढ़-लिख कर उससे ही तो सब कुछ संभालना था. एक दिन हर्ष के पापा का ड्राइवर उससे ऑफिस ले जा रहा था. वहां जाने से पहले उससे वकील की ऑफिस से कुछ ज़रूरी कागज़ात भी ले जाने थे. ड्राइवर ने गाड़ी पार्क की और चाबी को गाड़ी में ही छोड़ गया - जिस पर हर्ष की नज़र पड़ी. 15 साल की उम्र का जोश - हर नया कुछ आज़माने की उमंग ... जोश ही तो होता है, होश नहीं. हौसला कब बेवकूफी बन जाए - उम्र का यह मोड़ इस बात से अंजान होता है. हर्ष ड्राइवर की सीट में बैठ गया और गाड़ी स्टार्ट की. उसने संभलते संभलते गाड़ी चलाई और मेइन रोड पर ले गया. मगर बाकी गाड़ियों के साथ रफ़्तार बनाए रखने के चक्कर में एक्सेलरेटर पर कुछ ज़्यादा ही जम कर उसका पैर पड़ा ... और धड़ाम!
गाड़ी सीधे जा टकराई पार्क की हुई एक स्कूटर से. हर्ष हक्का-बक्का सा, सहमा सा गाड़ी में ही था. स्कूटर का मालिक वहां आ पहुँचा, कुछ लोग इकट्ठा हुए और ड्राइवर भी वहां आ पहुँचा. ड्राइवर ने तुरंत ही दरवाज़ा खोल कर हर्ष से कहा "आप बाहर आ जाइए". गाड़ी पर थोड़ी सी खराशें आई थी और स्कूटर को भी कुछ नुक्सान हुआ था. ड्राइवर ने बड़ी समझदारी से मामला संभाल लिया और स्कूटरवाले को यकीन दिलाया कि उनके मालिक स्कूटर की मरम्मत का सार खर्च उठाएंगे, बस वह रिपोर्ट न दर्ज कराए. स्कूटरवाला मान गया, बात दब गई. ड्राइवर गाड़ी लेकर ऑफिस गया और हर्ष के पापा को सारी घटना बयान कर दी. ड्राइवर के जाने के बाद, पापा की डाँट से बचने के लिए हर्ष ने अपने पापा से कहा "अनूप जी झूठ बोल रहे हैं. वह गाड़ी उनसे ही टकराई थी. मुझे डरा-धमका कर कहा कि अगर मैंने आपसे सच कहा तो मेरी खैर नहीं". पापा अपने बेटे को बखूबी जानते थे. उन्होंने सोचा 'अभी छोटा है. बड़ा होगा खुद कर समझ जाएगा कि झूठ बोलना खुद अपने पैर काटने बराबर है'.
अगले दिन जब हर्ष इमरान से मिला तो गाड़ी टकराने वाली सारी बात बताई. फ़र्क - दोस्त को सब सच बताया. दोस्त थोड़ी न डांटेगा. पर इमरान सच्चा दोस्त था. डांटा नहीं, पर समझाया "तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. सोच अगर अनूप जी बात न संभालते और पुलिस आ जाती तो?"
"अरे! तो क्या? पापा संभाल लेते ना!"
"नहीं हर्ष. हमें हमेशा उन लोगों की कदर करनी चाहिए जो खुद के सिद्धांत को एक ओर रख कर हमारे लिए झूठ बोलते हैं, हमारी मदद करते हैं."
"अरे बहुत मिल जाएँगे ऐसे."

"नहीं हर्ष, जिस दिन उन्हें कोई और मिल गया जो उनकी कदर करता है तो वे हमारा साथ छोड़ देंगे. खैर, यह बता की आज का मैच कहाँ देखेंगे - तेरे घर या मेरे घर?"



(... to be continued)

Thursday, 19 May 2016

जिस दिन ... 1

- 1 -

हर्ष ने अपनी किताबें कबर्ड में रख दी. दिवाली की छुट्टियों में होमवर्क कौन करे? दूध पीया और इमरान के घर भागा. इमरान जूते पहन रहा था. दोनों ने मिल कर तय किया था कि स्कूल से मिला होमवर्क छुट्टियां खत्म होने के तीन दिन पहले शुरू करेंगे. मंदिर के पीछे बड़े मैदान की तरफ बॉल और बेट लेकर चल दिए.
हर्ष ने कहा "याद है ना आज पहले मैं बैटिंग करूँगा?"
"हाँ याद है." इमरान ने जवाब दिया. फिर कुछ हिचक कर कहा "हर्ष, तूने आज शुभम के साथ जो किया वह ठीक नहीं था."
"मतलब?"
"मतलब एक तो उसने तुझे अपनी किताब दी जिससे तू अपना छूटा हुआ होमवर्क कर सके और तुम्हे मेथ्स के प्रश्न हल करने में मदद भी की. मगर जब उसने तुमसे पुछा कि क्या वह हमारे साथ खेल सकता है तुमने साफ़ मना कर दिया?"
"अरे छोड़ ना! वह नहीं होता तो कोई और होता मदद करने के लिए."
"हाँ होता. मगर फिर भी ... एक दिन के लिए ही खेल लेता हम दोनों के साथ. पता है अम्मी कहती है हमें हमेशा उन लोगों की कदर करनी चाहिए जो हमारे लिए अपना वक़्त निकाल कर हमें मदद करते हैं."
"उफ़ ओह! बहुत मिल जायेंगे ऐसे!"
"नहीं हर्ष. जिस दिन उन्हें कोई और कदर करने वाला मिल जायेगा तो वे हमारा साथ छोड़ देंगे. अच्छा यह ले बेट पकड़. मैं ईंट ले आता हूँ."
स्टंप्स की जगह चार ईंटो को एक के ऊपर एक रख कर वन-डे क्रिकेट मैच शुरू हुआ - ऐसी दो टीम के बीच में जिनमे एक एक खिलाड़ी ही था और हर खिलाड़ी की उम्र 8 साल की थी.


(to be continued ...)

Wednesday, 11 May 2016

ख़त - 11

'बिज़नेस कैसा जा रहा है? ऑपरेशन के बाद मम्मी की तबियत तो ठीक रहती है ना? रोहन कैसा है? कल मैं पापा की आँखों का चेक-अप करवाने जा रही हूँ. कुछ दिनों से सर में दर्द की शिकायत कर रहे हैं. शायद नए चश्मे की ज़रुरत हो उनको. ध्रुव ने पिछले हफ्ते से स्केटिंग क्लास शुरू की है और रोज़ शाम 7 बजे स्केटिंग के लिए जाता है. चलो, आज रविवार है तो उससे बाहर घुमाने ले जा रही हूँ. मम्मी पापा अपना आशीर्वाद भेजते हैं. 
अपना खयाल रखना - नैना.'
मन की ख़ुशी आँखों की चमक बन कर झलक रही थी. उसने ख़त को फिर से पढ़ा. गुलाबी रंग के लिफ़ाफ़े में डाला. कबर्ड खोला और दो साल से हर महीने लिखे जाने वाले ख़त के संग्रह में इस ख़त को भी रख दिया. 

Tuesday, 10 May 2016

ख़त -10

"क्या?"
"मुझे डिवोर्स चाहिए. तलाक."
"पी मैंने थी पर लगता है तुम्हे चढ़ गयी! या रात को चुपके से तुमने दो तीन पेग मार लिए थे?"
"मैं मज़ाक नहीं कर रही."
"तो होशवाली कौनसी बात कर रही हो?"
"होश में आई हूँ इसलिए तो कह रही हूँ."
"ओह! कल के चांटे की वजह से? ऐसे तो कई चांटे खाये हैं तुमने. फिर एक चांटे का इतना असर? नफरत की वजह से ..."
"नफरत नहीं पराग. मोहब्बत. खुद से मोहब्बत! ज़िन्दगी से मोहब्बत! जीने की चाह से मोहब्बत!"
"देखो मुझे कोई स्टुपिड सा ड्रामा नहीं चाहिए. वरना कल जिस ज़ोर की पड़ी थी ..."
"हाथ उठा कर तो देखिये पराग! यहाँ के डॉमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट के तहत आपको जेल न भिजवाया तो कहना. यहाँ सब पड़ोसी, हमारे डॉक्टर, रिश्तेदार सब वाकिफ़ है इस बात से कि आप मुझ पर हाथ उठाते हैं. उनमे से किसी एक की गवाही ही काफ़ी होगी. फिर मुझसे तो क्या, ध्रुव से मिलने के लिए भी कोर्ट की परमिशन लेनी पड़ेगी. रुक क्यों गए? हाथ उठाइए मिस्टर पराग दीक्षित!"
पराग को ऐसा लगा जैसे किसी ने उससे ज़ोर से मुक्का मारा हो. वह गुस्से में गाडी की चाबी ले कर बाहर चले गया. क्या हो गया था नैना को? कल रात का गुस्सा उतार रही होगी शायद. उसने रात को किसी पब में ही खाना खाया. देर रात घर लौटा तो देखा नैना टीवी देख रही थी. उसने ध्रुव को खाना खिलाकर सुला दिया था. पराग ने कोट उतारते हुए कहा "मैं खाना खा कर आया हूँ."
"मैंने आपसे पूछा?"
पराग इस बेरुखे जवाब से कुछ दंग सा रह गया. "एक काम करना. कल मैं काम पर जाऊं तो तुम डॉक्टर के पास जाकर अपने दिमाग की जांच करवा लेना."
इतना कह कर वह अपने कमरे में सोने चला गया.
अगले दिन नैना ध्रुव को साथ लेकर गई ... पर डॉक्टर के पास नहीं. वह सिटीजन्स एडवाइस ब्यूरो में गई. 
यह नागरिक सलाह केंद्र इंग्लैंड के हर शहर में होता है. यहाँ से आम लोगों को कानूनी सलाह और सहायता मुफ्त में दी जाती है. वहां से नैना ने डिवोर्स के लिए सारी ज़रूरी जानकारी - जैसे की कानूनी कार्यवाही, मार्गदर्शन - और एक अच्छे सॉलिसिटर (वकील) का नाम और नंबर भी ले आई. 
बस उसने फिर कभी मुड़ के पीछे नहीं देखा. ध्रुव पहले तो बौखलाया हुआ सा था, हैरान था पर उसने पराग के साथ इतना वक़्त ही नहीं बिताया था कि वह अपने पापा की कमी ज़्यादा महसूस करे ... और फिर आजकल उसकी मम्मी भी बहुत खुश रहने लगी थी ... हमेशा मुस्कुराती रहती थी ... ध्रुव के लिए यह काफ़ी था. पराग के एहम ने उससे नैना के पेटिशन को रोकना मुनासिब नहीं समझा. अगर वह ऐसा करता तो दुनिया यही कहेगी न कि पराग को नैना की ज़रुरत है, उसकी गरज है? वह नैना को दिखाना चाहता था कि उसके रहने या न रहने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था. पराग का यह एहम नैना के लिए आशीर्वाद समान साबित हुआ - उससे एक साल में ही डिवोर्स मिल गया. 
नैना ध्रुव को लेकर इंडिया चली आई. उसके माँ-बाप को अफ़सोस तो हुआ कि उनकी बेटी का विवाहित जीवन सफल न रहा मगर साथ ही उन्हें यह ख़ुशी भी थी कि नैना ने हिम्मत करके अपने आपको उस नर्क से छुड़ा लिया था और सही सलामत उनके पास थी. जिस आदमी ने कभी भी अपनी बेटी पर हाथ न उठाया हो उससे कोई अपनी जागीर समझ कर मारे तो? पराग अब अगर नैना के पिता के सामने आता तो वे उससे चांटे मार मार कर मार ही डालते! नैना मुंबई के एक कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी करती थी. ध्रुव भी एक अच्छी सी स्कूल में पढ़ता था और अपने नाना-नानी के प्रेम की छाँव में खिल रहा था. 
आकाश ने इंडिया में ही अपना व्यवसाय शुरू किया. मगर पैसों की ज़रुरत पढ़ी तो वह एक बड़ी कंपनी से आई नौकरी की ऑफर को ठुकरा न सका और बिज़नेस की ज़िम्मेदारी छोटे भाई को सौंप दी. यूँ तो वह बड़ा व्यस्त रहता पर फिर भी फेसबुक पर अपने जीवन की छोटी बड़ी बातें अपने लोगों के साथ बांटता रहता.
ज़िन्दगी की राह भी बड़ी अजीब है. हम भूल जाते हैं कि रौशनी हमारे अंदर होती है. बाहर का अँधेरा देख कर घबरा जाते हैं और इस घबराहट में उस रौशनी को भूल जाते हैं और हमें आगे राह दिखाई नहीं देती. अगर हम खुशनसीब होते हैं तो कोई हमें आकर याद दिला जाता है कि अपनी आँखें खोलो, अपनी ही चेतना से आगे रास्ता देखो ... या फिर जैसे हमारे अंदर ही दिया, बाती और तेल होता है ... हम खुद उस दीये को जलाना भूल जाते हैं. फिर कोई इंसान जीवन में एक दियासलाई बनकर आता है और हमारे मन के दीये को जला जाता है. आकाश भी नैना के जीवन में एक दियासलाई बनकर आया था. नैना को नयी राह भी दिखी और जीवन फिर से रोशन हो गया. उस एक रात ...
आज ... अभी ... यहाँ ... नैना अपने मन के उड़नखटोले के ज़रिये वापस लौट आई. उस अधूरे ख़त की तरफ. 


(... to be continued)

Monday, 9 May 2016

ख़त - 9

आप कड़ी धुप में चले जा रहे हो और कहीं एक घने पढ़ के नीचे ठंडी छाँव मिल जाए तो? आप बारिश में भीगते भीगते जा रहे हों और कहीं कोई सराय मिल जाए तो? ठंड में हाथ पैर ठिठुर रहे हों और ऐसे में तप्ती आग के करीब बैठने मिल जाये तो? क्या महसूस करेंगे? राहत? चैन? सुकून? या कोई शब्द नहीं सूझ रहा? बस वैसा ही एहसास नैना को हुआ. उसने अपने आप को आकाश से अलग करने की कोशिश भी नहीं की. आकाश के चुंबन में वासना नहीं थी ... कुछ और था ... चुंबन से आलिंगन ... वह आकाश से लिपट गई ... उसकी उँगलियाँ आकाश के बालों में सुलझ उलझ रही थी ... कहाँ शरीर खत्म होते और कहाँ साये शुरू होते ... पहली बार नैना की आँखों में प्रेम के अधिप्रवह के कारण आंसू निकले रहे थे. आकाश के सीने से लग कर जैसे उसने अपने दिल के दर्द उसके साथ बाँट दिए हों. आकाश उससे सोफे तक ले गया. दोनों बैठे और उसने फिर से नैना को चूमा. उसके बाल, उसकी आँखें, उसके कान, उसके गाल, उसके होंठ ... और नैना ... तप्ती ज़मीन पर जैसे बारिश की बूँदें गिर रही हों. नैना उससे लिपटी रही और वह नैना के बाल सहलाता रहा ... और यूँही न जाने कब ... कितने दिनों बाद उससे चैन की नींद आई.

टिंग टिंग टिंग ... नैना अपनी माँ के साथ किसी मंदिर में थी. कुछ जाने कुछ अनजाने चेहरे नज़र आये ... एक औरत कब से मंदिर की घंटी बजाये जा रही थी ... टिंग टिंग टिंग ...नैना की माँ उससे कुछ कह रही थी पर घंटी की आवाज़ की वजह से उससे कुछ साफ़ सुनाई नहीं दे रहा था. उसने आगे बढ़कर उस औरत के कांधे पर हाथ रखा ... टिंग टिंग टिंग ... यह तो उसके फ़ोन से बज रही थी ... वह एकदम से जाग गई. उसके सुबह 5 बजे का अलार्म! हर शनिवार रात को वह यह अलार्म बंद कर देती थी मगर ... उफ़! अपने आपको सोफे पर पाकर रात की यादें ताज़ा हों गई. आकाश वहां नहीं था. लगता है वह उसकी बाहों में सो गई होगी और आकाश ने उस पर चादर रख दी होगी. और अगर पराग ने पुछा की वह वहां नीचे क्यों सोई थी तो? कहीं पराग नीचे तो नहीं आया था
वह दबे पाँव अपने कमरे में गई ... पराग खर्राटें भर रहा था. फिर ध्रुव के कमरे में ... वह भी सो रहा था. वह मुड़ कर चली जाती मगर गेस्ट रूम का दरवाज़ा आधा खुला था. झाँक कर देखा ... आकाश और सागर सो रहे थे. वह नीचे किचन में गई, किचन साफ़ किया और फिर से अपने कमरे में चली गई. आधे घंटे के लिए सो जाएगी ... मगर ... रात की  यथार्थता उससे एक सपना सा लग रही थी ... वह करवटें बदल बदल कर जैसे आकाश की बातों को उलट पुलट कर उन्हें सेच रही हो. उसने उस हकीकत को जीवित करते हुए सामने रखा जिससे नैना ने अपने दिल के किसी कोने में दफ़न कर दिया था. और इसी सोच में सात बज गए.

नैना नहा-धो कर, पूजा करके किचन में गई और नाश्ता बनाने लगी. पहले ध्रुव, फिर सागर, फिर आकाश और फिर पराग ... बारी बारी सब नीचे आए. नाश्ता करके सागर और आकाश बिर्मिंघम के लिए निकल दिए. उसने आकाश से नज़रें नहीं मिलाई पर जाते जाते आकाश ने उससे कहा 'अपना खयाल रखना'. पर खयाल में तो जैसे अब किसी और के खयाल शामिल को करना? उनके जाते ही पराग फिर से सो गए. नैना ने ध्रुव को नहलाया, तैयार किया और पार्क में ले गई. वह उस माहौल से दूर होना चाहती थी जिसकी वजह से उसका मन दुविधा में था ... एक अजीब असमंजस में था. एक घंटे बाद ध्रुव को अपने पड़ोसी के बेटे के साथ खेलने के लिए उसके घर पर छोड़ आई. अपने घर आई तो देखा पराग फ्रेश हो कर नीचे सिटींग रूम में पेपर पढ़ रहा था. उसने गहरी साँस ली और कहा "पराग, मुझे डिवोर्स चाहिए."



(... to be continued)

Saturday, 7 May 2016

ख़त - 8

आकाश इस एक नाम से समझ गया कि नैना के दिल में क्या था.
"माफ़ कीजिये नैना जी, ध्रुव को अपना बहाना मत बनाइये."
"बहाना?"
"और नहीं तो क्या? अगर आप ऐसा सोचती हैं कि ध्रुव पर उसके पिता का साया रहेगा तो यह भी सोचिये - वह जिससे देख कर बड़ा होगा उसी के जैसा बनेगा. क्यूंकि उसने इतने करीब से किसी और को जाना ही नहीं होगा. और एक हकीकत यह भी है कि बड़े तो सब बच्चे होते हैं - चाहे वे माँ-बाप के साथ रहते हो या अनाथ-आश्रम में. वहां भी बच्चे तहज़ीब और हुनर सीखते हैं. फिर ध्रुव अकेला तो नहीं. उसके साथ उसकी माँ जो है."
नैना अचानक खड़ी हो गई. यह ठीक नहीं था. आकाश को वह इतने करीब से जानती तक नहीं थी कि उससे अपने दिल की बात कहे या उसकी कोई बात सुने. उसके नसीब में जो था वह उससे कैसे भाग सकती थी? और फिर भी ... न जाने क्यों ... उससे आकाश में किसी अपने का एहसास हो रहा था. उसने अपने कानों पर हाथ रखे और आकाश से कहा "मैं आपकी कोई बात नहीं सुन्ना चाहती. प्लीज़ आप चले जाइए."
आकाश ने नैना की कलाइयां पकड़ते हुए उसके हाथ कानों से हटा कर कहा "क्यों सच से भाग रही हैं?"
"मैं नहीं भाग रही!"
"तो सामना क्यों नहीं करती?"
"क्या करूँ सामना करके? कुछ नहीं बदलेगा!"
"क्योंकि आप नहीं चाहती कि कुछ बदले."
"यह झूठ है!"
"नहीं, यही सच है! आपको दुःख सहने में मज़ा आता है."
"आप क्या बोले जा रहे हैं?"
"हाँ नैना! सच तो यह ही कि आपको अपने आप पर दया खाने की आदत पड़ गई है."
"स्टॉप इट!"
"क्यों? यही सच है ना?"
"चुप हो जाई..."

मगर तब तक आकाश के होंठ नैना के होंठ तक पहुँच चुके थे.



(to be continued ...)