Wednesday, 8 July 2026

यह कोई वक्त है चाय पीने का?


 


“चलिए न, एक कप चाय पीने चलते हैं”।

“यह कोई वक्त है चाय पीने का?”, मनीष चिढ़ कर बोला। मीरा मुस्कुरा कर बोली “चाय पीने का भी कोई वक्त होता है?”। मनीष ने सिर हिलाते हुए कहा “मुश्किल से रविवार ही तो मिलता है जब मैं घर पर आराम से बैठ सकूँ। तुम घर पर ही चाय बना कर पी लो”। और यह कहते हुए मनीष फिर से अखबार पढ़ने लगा। उसकी नज़र काले अक्षरों की बातों पर टिकी थी, अपनी पत्नी की काली आँखों की बात पढ़ न पाया। अगर पढ़ पाता तो जानता कि उन आँखों में लिखा था “मनीष, मैं भी सारा दिन घर का काम करती हूं, तुम्हारे माँ बाप, बहन की सेवा करती हूं। तुम रोज़ काम से थके हारे आते हो, खाना खा कर सो जाते हो। चाय पीने का तो बस बहाना है। मुझे तुम्हारे साथ अकेले वक़्त बिताना है, बातें करनी हैं। ऐसी बातें जिनमें घर खर्च, डॉक्टर के अपॉइंटमेंट, बुआजी के बेटे की शादी का ज़िक्र न हो।” मीरा उठ कर रसोईघर में चली गई। रविवार के दिन सबको कुछ अलग खाना होता है और कुछ अलग बनाने में वक़्त लगता है। 


दो साल बाद मीरा मां बनी। पहले बेटा और फिर बेटी हुई। बच्चों को बढ़ा करते करते साल बीतते चले गए। मनीष पूरी लगन से अपनी नौकरी कर रहा था और तरक्की भी हो रही थी। बेटा और बेटी बड़े हुए, पढ़े लिखे, फिर बेटी की शादी करवा दी। बेटे को अच्छी नौकरी मिल गई और दो साल में उसकी भी शादी करवा दी। वह अपनी पत्नी, निशा, को लेकर दिल्ली चला गया क्योंकि उसकी नौकरी भी वहीं थी। बहन की भी शादी हो गई। मां बाप चल बसे। अब रहे सिर्फ मनीष और मीरा। मनीष एक साल में निवृत होने वाला था। अच्छी पेंशन के साथ अब मीरा के साथ आराम से बाकी ज़िन्दगी कटेगी। पर “तेरे मन कछु ओर है बंदे, मालिक के कछु ओर”। मीरा को टाइफाइड हो गया और वह चल बसी। 


द्विचक्रिय वाहन का एक पहिया निकल जाए फिर वह वाहन नहीं रहता। मनीष को मीरा का साथ छुटना अब खलने लगा था। मीरा, जो उसके पसंदीदा खाने से लेकर इस्त्री किए हुए रुमाल तक का खयाल रखती थी, अब नहीं थी। वह जैसे मनीष के सांसारिक जीवन की ज़िम्मेदारियां निभाने आई थी, साथ निभाने नहीं। इस सब का असर मनीष पर मानसिक और शारीरिक रूप से होने लगा। सब ने सलाह दी कि बेटे के साथ रहने चले जाओ। बेटे से भी अपने पापा का हाल देखा नहीं जा रहा था। उसने भी मनीष से कहा कि वह अब दिल्ली आ कर उनके साथ रहे। 


मनीष मान गया। घर तो नहीं बेचा पर सारी चीज़ों को संभाल कर रखने के बाद, अपने सामान के साथ दिल्ली के लिए अपने बेटे के साथ निकल पड़ा। वहाँ पहुंचते ही उसके बेटे ने उसका सामान कमरे में रखवा दिया और कहा “आप फ्रेश हो जाएं। निशा आती ही होगी। आज उसकी कंपनी का कोई इवेंट है”। मनीष नहा धो कर फ्रेश हो गया। अपने कपड़े अलमारी में रख दिए और बैग से मीरा की तस्वीर निकाली। अपने पलंग के करीब रखे मेज़ पर वह तस्वीर रखी और कहा “यह नई पारी की शुरुआत है। काश तुम यहाँ होती”। उसने खिड़की खोली और बाहर देखा। बच्चे खेल रहे थे, कुछ लोग टहल रहे थे, कुछ व्यायाम कर रहे थे। वह मुस्कुराया। उसे आवाज़ आई। शायद निशा आ गई होगी। उसने खिड़की बंद की। मीरा की तस्वीर को उठाया और गले लगाया। फिर कमरे से बाहर आया और बेटे से कहा “बेटा, एक कप चाय हो जाए?”। बेटे ने कहा “यह कोई वक्त है चाय पीने का?”।

~ शीतल सोनी


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