Friday, 22 October 2021
आठ ईंट
प्रेम नहीं ...
हम अपने शब्द वापिस नहीं ले सकते.
अलमारी या तिजोरी?
वह अक्सर अपनी बातें मुझसे कहता. काम में तरक्की हुई हो, घर पर कोई नई चीज़ खरीदी हो, कोई छोटी मोटी घटना हुई हो … सब बता दिया करता। मैं भी उसकी सारी बातें सुनती और अपने दिल के एक कोने में रख देती। बिल्कुल वैसे जैसे कोई अलमारी में चीज़ संभाल कर रख देता है।
और शायद हम सब किसी न किसी के लिए अलमारी ही हैं। कई बार यूँ भी होता है कि जिसने चीज़ रखी हो वह भूल गया हो पर हमें याद रहती है … क्योंकि हम उस चीज़, उस बात को संभाले हुए हैं। कुछ लोग ख़याल रखते हैं कि उनमें रखी हुई चीज़ को देखने का हक़ सिर्फ रखने वाले को होता है। हर किसी को बताया नहीं करते कि देख मुझ में किसने क्या रखा है। और कुछ लोग तो खैर खुली अलमारी से होते हैं … कोई अपनी बात बताता है और साथ में दूसरों की बातें देख लेता है।
और कुछ बहुत अज़ीज़ लोग होते हैं जो तिजोरी होते हैं। आप उनसे किसी ओर के बारे में कुछ जान ही नहीं सकते। बड़ी हिफाज़त से संभाल रखते हैं आपकी हर बात, हर चीज़।
तो, आप क्या हैं? अलमारी या तिजोरी?
शीतल सोनी
Thursday, 21 October 2021
जाओ तुमसे बात ही नहीं करनी मुझे.
~ शीतल सोनी
मौसी जी
वे मेरे पापा की मौसी थी. मगर हम बच्चे भी उन्हें मौसी ही बुलाते थे. ज़रा बातूनी थी और उनका सामान्य ज्ञान भी अच्छा भला था. कभी कभी किसी त्योहार पर, जन्म, विवाह व मरण प्रसंग पर अपने गाँव से आती. इस बार मरण प्रसंग था.
मौसी जी के एक रिश्तेदार दिल का दौरा पड़ने से चल बसे थे. नहीं, चल बसे नहीं. "प्रभु के चरणों" को पा गए थे. यह बात बड़े बुज़ुर्ग अक्सर कहते. वे मृतक के घर शोक मनाने गई. अंतिम क्रिया के पश्चात वे घर आई. पापा ने उनसे एक दिन रुक जाने को कहा. वे बोली "ना बेटा. मुकेश के बेटे की शादी है हफ्ते बाद. बहुत तैयारियां करनी है. सारी मिठाइयाँ मेरे बताए गए तरीके से बनेंगी."
माँ ने मौसी जी के लिए रोटी, आलू की सूखी सब्ज़ी, हरी चटनी और आचार एक डिब्बे में भर कर दिया क्योंकि उनका गांव दस घण्टे दूर था. बीच राह में कहीं खाने की व्यवस्था न हुई तो भी मुश्किल न हो. मौसी मेरी माँ से बोली "बेटा, कुछ सुपारी और सौंफ भी देना. और पास की दुकान से कुछ चिक्की मंगवा देना". माँ ने भाई से कहा और वह ले आया. हम भाई बहनों को मौसी के रवैये पर आश्चर्य हुआ. पापा उन्हें बस स्टैंड तक छोड़ आए.
जब पापा वापस घर आए तो भाई ने कहा "मौसी जी तो मानो पिकनिक के लिए आई हो. ऐसा लगा ही नहीं कि वे किसी के मरण का सोग मनाने आई हो."
पापा ने कहा "मैंने समझाया है न कि पूरी बात जाने बिना किसी के लिए कोई अभिप्राय मत बनाओ. रही बात मौसी की. उन्होंने शादी के दस साल बाद अपना पति खोया है, अपनी 4 साल की बेटी की मृत्यु देखी है. उन्होंने जश्न भी मनाए हैं और मातम भी. अपने जीवन में बहुत सारे जन्म व मरण देखे हैं और इन सब से इतना सीख लिया है जन्म और मरण रुकते नहीं, चलते रहेंगे. ज़रूरी यह है कि जीवन चलता रहे."
Tuesday, 25 August 2020
भक्ति
छाया बहुत खुश थी. पाँच दिन बाद महाशिवरात्रि थी और कल पंडित जी मूर्ति लेने आएँगे और मंदिर में उसकी स्थापना करेंगे. मूर्ति. शिवजी की मूर्ति. सब कहते थे छाया के हाथों में जादू था और उसे जैसे प्रभु का वरदान मिला हो … उसकी बनाई हुई मूर्तियों में जैसे प्रभु साक्षात बसते हो. और इसलिए चौधरी जी की पत्नी ने छाया से महादेव की मूर्ति बनाने को कहा, जिसकी स्थापना वह अपनी हवेली के मंदिर में करेंगी.
छाया कमरे में गई और दीया जलाया. वह मूर्ति को देख रही थी … महादेव की जटाएँ, उनके तीसरे नयन, गले में सर्पमाला, हाथ में त्रिशूल और त्रिशूल पर डमरू. और कहीं धीमी से डमरू की ध्वनि सुनाई देने लगी. छाया ने महादेव की आँखों में देखा … चेतना देखी. उसे दिव्यता की अनुभूति होने लगी. और मूर्ति से आवाज़ आई "क्या देख रही हो छाया?"
छाया चौंक गई. "प्रभु! आप साक्षात!"
"हाँ छाया, तुमसे कुछ पूछने आया हूँ."
"मैं तो धन्य हो गई भगवन!"
"तुमने मेरी व अन्य देवों की बहुत मूर्तियां बनाई है. परन्तु इस बार तुमने मिट्टी, पानी, भक्ति के उपरांत द्वेष क्यों मिलाया?"
"द्वेष?"
"हाँ द्वेष. जो भाव तुम्हारे मन में उत्तम रहता है उसका प्रभाव तुम्हारी शिल्प कला पर पड़ता है. तुमने अपने मित्रों के संग निर्मला के कपड़ो पर अट्टहास किया. उस पर पत्थर फेंके. तुमने विनोद के बांसुरीवादन पर उपहास किया. उस पर भी पत्थर फेंके. तुमने विधि की दरिद्रता का मज़ाक उड़ाया. उस पर भी पत्थर फेंके. क्यों छाया? तुम्हारे और तुम्हारे मित्रगण में इतना द्वेषभाव क्यों?"
छाया ने हाथ जोड़ते हुए कहा "द्वेषभाव नहीं प्रभु. हम तो केवल अपना मन बहलाने के लिए उन पर हंस रहे थे. हमें उन सब से कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं."
"किसी को दुखी करने से तुम्हारा मन बहलता है? निर्मला की माँ दिन रात सबके घरों को साफ करके पैसे कमाती है. इतने की वह अपने और परिवार के जीवन की मूल आवश्यकता पूरी कर सके. उसमें से कुछ पैसे बचा कर उसने निर्मला के लिए नए कपड़े लिए थे. तुम सब ने पत्थर निर्मला पर नहीं, उसकी माँ की मेहनत पर मारे. निर्मला घर जा कर रोइ और उसे दुखी देख उसकी माँ भी रोइ. मन बहल गया तुम सब का?"
"ओह! मैं यह नहीं जानती थी अन्यथा …"
"तुम सब ने विनोद के बाँसुरिवादन का मज़ाक उड़ाया. उस पर पत्थर फेंके. विनोद दिन भर खेत में काम करता है. माँ नहीं है और पिता अंधे हैं. अपने छोटे भाई को अच्छी विद्यालय में उच्च शिक्षा दिलवा रहा है. घर आ कर खाना बनाता है, अपने पिता को खिलाता है, घर के सारे काम करता है. किसी से कोई मदद नहीं मांगता है. उसके जीवन में सारी वेदनाओं का सार वह बांसुरी में पिरोता है. किसीको अड़चन रूप नहीं बनता. फिर उस पर क्यों पत्थर फेंके?"
"भगवन, वह सुर में बांसुरी नहीं बजाता है तो …"
"सूर में? यह निश्चय करने के लिए तुम सब में से कौन श्रेष्ठ संगीतकार है? क्या वह किसी प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहा था? और विधि? उसकी दरिद्रता तुम्हारे मन में मानवता की दरिद्रता से तो भली ही है. वह दिन में एक ही बार भोजन करती है पर उसमें से भी राम-रोटी निकाल कर पशुओं को खिलाती है. उसकी दरिद्रता पर पत्थर मार कर तुमने कौनसा धनाढ्य मिला?"
"भगवन! मैं और मेरे मित्रगण इन सब की व्यथा से अनजान थे. हम पत्थर उन्हें चोट पहुंचाने के लिए नहीं मारते हैं. हम तो केवल उनकी दुर्बलता, वर्ण और कला पर हंस रहे थे."
"जो मनुष्य रंग, वर्ण, रूप, कद-काठी, धनाढ्य, सक्षमता, जाति, बुद्धिमत्ता, साक्षरता पर भेदभाव करे वह मेरा भक्त हो ही नहीं सकता!"
"परंतु प्रभु मेरे मित्रगण …"
और प्रभु क्रोधित स्वर में बोले "तो जाओ छाया! तुम अक्षय, विनय, हिना, दिशा, साक्षी की ही भक्ति करो!" यह कह कर वह अदृश्य हो गए. छाया चिल्लाई "नहीं भगवन!"
पानी टपकने की आवाज़ से वह जाग गई. प्रातः हो रही थी. यह कैसा दुःस्वप्न था? विचित्र! आज के दिन ऐसा स्वप्न आना उसे अशुभ सा लगा. पंडित जी मूर्ति को ले जाएं उससे पहले वह प्रभु को खीर का भोग चढ़ा देगी … यह सोच कर उसने नाहा धो कर खीर बनाई. बड़े प्रेम से. और द्वार खटकने की आवाज़ आई. पंडित जी आ गए होंगे. उसने द्वार खोला. पंडित जी, पंडिताइन जी और चौधराइन जी का स्वागत किया. उन्हें फल दिए और कहा "आप मूर्ति को ले जाएं उससे पहले मैं भगवन को खीर का भोग लगा दूँ?"
पंडित जी बोले "अवश्य पुत्री!"
हाथों में खीर की कटोरी लिए वे सब मूर्ति वाले कक्ष में गए. और सब अवाक. मूर्ति नहीं थी. वहाँ तो पत्थरों का छोटा ढेर था.




