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Sunday, 17 September 2017

बोलो हुआ क्या है?


आओ बैठो पास मेरे
बोलो, हुआ क्या है?

बातों की लड़ी
जो कभी ख़तम ही नहीं होती थी
मिज़ाज पर भी अपनी
खूब चलती थी.
आज मौन छा गया है,
बोलो, हुआ क्या है?

वह हंसना हँसाना
बेवजह रूठना, प्यार से मनाना
किसी अनदेखी अनसुनी ग़लतफहमी में
सब कुछ खो गया है,
बोलो, हुआ क्या है?

क्यों यह खिलखिलाता सा चेहरा मुरझाया सा है?
जिन आँखों में कल के सपने चमकते थे
उन पर आज मायूसी का पर्दा क्यों है?
माथे पर यह शिकन क्या है?
बोलो, हुआ क्या है?

तुम नासाज़, तनहा, नाराज़,
परिंदे से, मगर बेपरवाज़
न कोई शोर, न कोई आवाज़,
इंसान जैसे पुतला हो गया है,
बोलो, हुआ क्या है?

मैं तुम्हारे दर्द दूर तो नहीं कर सकुंगी,
बस तुम्हारे माथे पर हाथ सेहला लुंगी,
होंसला बढ़ने को तुम्हारे, दो लफ्ज़ बोल दूंगी.
शायद दिल को तुम्हारे, थोड़ा सा ही सही
मगर सुकून तो मिले.
ज़िन्दगी जीने में थोड़ी सी ही सही
राहत तो रहे.

आओ बैठो पास मेरे,
बोलो, आखिर हुआ क्या है?


Saturday, 20 August 2016

बहानेबाज़ियां



शीतल पवन लहरा रहा है,
सुबह की पहली किरणे
आकाश में अपनी बाहें फेला रही है.
ऐसे मौसम में चलो कहीं टहलने चलते हैं.
"नहीं. मेरे सिर में दर्द है.
मैं नहीं आ सकता".

रिमझिम बरसात में
गरम गरम पकोड़े और भुट्टे
 - इन्हें खाने में कितना मज़ा आता है.
चलो युहीं कुछ चटर-पटर खाने चलते हैं.
"नहीं. मेरी तबियत नासाज़ है.
मैं नहीं आ सकता".

यूँ तो मनोरंजन के माध्यम हैं कई
पर दिल और दिमाग को बहलाये ...
चलो ऐसा कोई नाटक देखने चलते हैं.
"नहीं. मुझे बहुत काम है.
मैं नहीं आ सकता".

कितने संदेश भेजती रहती हूँ तुम्हे,
किसी एक का भी जवाब क्यों नहीं देते मुझे?
क्या कोई नाराज़गी है?
"नहीं. मेरा मेनेजर मेरे संदेश व्यव्हार संभालता है.
मैं कुछ नहीं देखता या पढता".

यह "सिर का दर्द",
यह "नासाज़ तबियत",
यह "बहुत काम",
यह "मेनेजर का संदेश व्यवहार" ...
मैं जानती हूँ तुम बहाने बना रहे हो,
मैं नहीं जानती कि तुम बहाने क्यों बना रहे हो.

मगर फिर भी तुमसे यूँ
बार बार पूछना अच्छा लगता है ...
इस कुतूहल से कि अब की बार
कौन सा नया बहाना बनाओगे तुम.

तो, आज रात बड़ी सुहानी है,

चलो बाहों में बाहें डाले कहीं घूमने चलते हैं.

Tuesday, 16 August 2016

क्या हो तुम?

एक मिथ्या हो? भरम हो?
मेरी कल्पना हो या वास्तविकता हो तुम?
तुम्हारा एहसास होता है
पर देखूं तो तुम पास नहीं होते.

एक दिन, तुम्हे मिलकर यह बताना है
कि मेरे लिए क्या हो तुम.
मगर ...
कैसे कहूंगी?
वह शब्द कैसे होंगे
जिनसे तुम्हारी पहचान करवाऊँगी?

जो नयन व्याकुल है
रूबरू तुम्हें देखने को
उनके भौं के बीच
बिंदिया नहीं.
वहां हो तुम.

रात को जब
मुस्कुराहट का मुखौटा उतार देती हूँ,
अपने भीतर झाँक सकूँ
आँखें बंद कर के सो जाती हूँ.
बस, मेरे पास आकर लेट जाते हो तुम.

और फिर जब तुम मेरा माथा चूमते हो 
टीस तुमसे डर कर भाग जाती है.
मेरे बालों को सहलाते हो तुम
... नींद आ जाती है.

सुबह जब नींद जाती नहीं
आँखें पूरी तरह खुलती नहीं
तब तुम मुझे अपनी बाहों में ले लेते हो.
वह मुखौटे वाली नहीं
पर एक सच्ची मुस्कुराहट
मेरे चेहरे पर आ जाती है.
जब आँखें खोलती हूँ
खुद को अकेला पाती हूँ.
अभी अभी तो यहीं थे
फिर क्यों मुझे नज़र नहीं आते हो तुम?

वैराग और संसार के बीच
एक बहुत ही बारीक रेखा है.
वैराग का पलड़ा बार बार भारी हो जाता है.
संसार की तरफ जो खींच रही है मुझे
वही एक डोर हो तुम.

मेरी हर कविता में,
लेखन में
शब्दों के बीच जो रह जाती है
वह खाली जगह हो तुम.
मेरी जीवन गाथा का जो अंतिम वाक्य होगा

उस वाक्य के पूर्णविराम हो तुम.

Thursday, 9 June 2016

क्या कहूं?


"अब हम अलग हो जाते हैं,
मैं आज के बाद तुमसे नहीं मिलना चाहता".
इतना कह कर दामन छोड़ दिया तुमने.
आज मुद्दत बाद इस मेहफ़िल में नज़र आये हो.
यह मेरे पैरों तले ज़मीन कहाँ चली गई?
मैं काँच के टुकड़ों पर हूँ खड़ी.

कुछ भी तो नहीं बदला तुम में
- हर बात, हर अंदाज़ वही है.
होठों पर ज़र्द सा दाग,
गाल पर बड़ा सा काला तिल,
बातें करते वक़्त हाथों से इशारे करते रहना ...
कुछ भी तो नहीं बदला तुम में
- हर बात, हर अंदाज़ वही है.
यह मेरी आँखों में तिनको जैसा क्या चुभने लगा है?

और फिर तुम्हारी नज़र मुझ पर पड़ी.
बात करूँ या न करूँ?’
- उलझन तुम्हारे चेहरे पर झलक रही है.
पास आकर पूछ तो लिया
"कैसी हो?"
अरे पगले! इतना भी नहीं जानते?

मुर्दे बोल नहीं पाते.

Saturday, 4 June 2016

यह शब्द तुम्हारे ...



कब से बैठी हूँ
पास तुम्हारे,
तुम्हे शब्दों के सिवाय
कुछ दिखता ही नहीं.
मैं भी नहीं.

कितना प्यार है तुम्हे
अपने इन शब्दों से,
शब्दों से बनती
अपनी कविता से.

मैं कँगन खनकाती हूँ,
पुराने किसी गाने की धुन
गुनगुनाती हूँ.
पर तुम तो हर पल
अपने शब्दों को ही सहलाते हो,
उन्हें ही चूमते रहते हो.
उन्हें ही गले लगाते हो.

शायद मैं ही
झूठी आस लिए बैठी हूँ
कि तुम अब मेरी तरफ देखोगे.
पर तुम तो जैसे
मेरे होने से ही अंजान हो.

अब यह आस चुभने लगी है.
मुझे तुम्हारे पास
बैठने नहीं दे रही है.
मेरा चला जाना ही अच्छा होगा.
तुम्हे तो वैसे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

उठ कर दरवाज़े तक चली,
चौखट पर पैर ही रखा
कि तुम्हारी कविता से शब्द
दौड़े चले आए
और मेरे गले लग गए!

Wednesday, 1 June 2016

यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं


आज-कल यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.
न वक़्त देखते हैं
न अवसर देखते हैं,
हर पल हर जगह
बस उनकी ही बातों के लिए चले आते हैं.
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.

कितना डराती हूँ
कितना धमकाती हूँ.
"दुनिया क्या कहेगी? लोग क्या सोचेंगे?"
बार-बार यह बात समझाती हूँ.
पर शब्द उनकी ही बातों के लिए चले आते हैं.
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.

कौशल्या के राम होते तो वनवास भेज देती,
जशोदा के कान्हा होते तो इन्हें किसी पेड़ से बाँध देती.
मगर यह शब्द तो अंजनी-पुत्र जैसे हैं -
यहाँ से वहाँ
इधर से उधर भागते रहते हैं.
और उनकी ही बातों के लिए चले आते हैं.
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.

सोचा इन शब्दों को सबक सिखाऊँ.
मुंह से कुछ न बोलूं
उन्हें बाहर ही निकलने न दूँ.
कलम की स्याही में क़ैद कर दूँ
मैं कुछ भी न लिखूं.
क्योंकि
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं

मगर फिर मेरे यह शब्द रोने लगे.
घुट-घुट के जैसे मरने लगे.
मुझे उन पर तरस आया
और उनसे पुछा -
'क्यों हर पल उनकी ही बातों के लिए चले आते हो?
क्यों मेरा कहना नहीं मानते हो?'

शब्दों ने भी क्या खूब जवाब दिया -
'जब देखो तब हमें डांटती रहती हो.
उनके ख्यालों में जो खोया रहता है
अपने उस मन से तो कुछ नहीं कहती हो.'
उफ़!

आज-कल यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं ...

Saturday, 14 May 2016

मैं क्या करूँ?


एक काली उदास रात को
गहरी नींद की गिरफ़्त में थी मैं
ऐसे में वह मेरे सपनों में आया.
यूँ रुला भी गया, यूँ मना भी गया.
मुझसे गले लग कर मेरे आंसू पोंछता भी गया.
भीगी आँखें थी मेरी जब मैं जागी
इस कदर वह सपने को वास्तविकता में बदलता गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उससे सपनों से आज़ाद कर दूँ,
हकीकत में ही उससे क्यों न ले आऊं?
पर वह इस बात से अंजान
मुझसे नाराज़ हो गया, बहुत दूर हो गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उसकी मूर्ति ही बना लूँ.
मिटटी, पानी और प्यार मिलाया,
उसकी काया को अपने हाथों से संवारा 
एक शिल्पकार का हुन्नर दिखाया.
मगर उस मूर्ति में जान आ गई
और वह वहां से चला गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उसकी तस्वीर ही बना लूँ.
अपने कमरे की एक दीवार पर
कई रंगों से, प्यार भरे वर्ण से
उसकी मोहक तस्वीर बनाई.
एक कलाकार का हुन्नर दिखाया.
मगर उस तस्वीर में जान आ गई
और वह वहां से चला गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उसके नाम का एक काव्य लिखूं.
अपने ह्रदय के शब्दकोष से शब्द चुने
और उसके वर्णन में कई पद रचे.
एक कवियत्री का हुन्नर दिखाया.
मगर उस काव्य में जान आ गई
और वह वहां से चला गया.
अब मैं क्या करूँ?

जो भी प्रयास करूँ
वह तो उठ कर चला जाता है.
उससे मनाने के लिए
अब मैं क्या करूँ?

फिर शांत चित्त से सोचा.
मेरे मन में एक महल बनाया.
महल में एक भूलभुलैया बनाई.
उससे फिर से अपने विचारों में ले आई
और उस भूलभुलैया के बीच छोड़ आई.
वह वहां से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहा है.
वह आज भी मेरे विचारों में क़ैद है.
अब कोई बताये कि

वह क्या करे?

Sunday, 8 May 2016

मेरी माँ

दुनिया में सबसे प्यारी मेरी माँ!

सुबह की पहली किरण सी मेरी माँ,
काले आसमान में पूनम के चाँद सी मेरी माँ!

तप्ती गर्मी में शीतल वर्षा सी मेरी माँ,
ठिठुरती ठंड में आग की गर्मी सी मेरी माँ!

मैं डगमगाती तो ठीक से चलना सिखाती मेरी माँ,
और गिर जाती तो उठाकर संभलना सिखाती मेरी माँ!

मैं रोती तो मेरे आँसू पोंछकर मुझे हंसाती मेरी माँ.

मुझे लड़ना, आगे बढ़ना सिखाती मेरी माँ
और ज़रुरत पढ़ने पर रुक जाना भी सिखाती मेरी माँ!

मैं जीत जाऊँ तो मेरी पीठ थपथपाती  मेरी माँ
और हार जाऊँ तो हौसला बढ़ाती मेरी माँ!

मेरी हर अगुआई के लिए दुआ मांगती मेरी माँ
और जब थक जाऊँ तो माथा सहलाती मेरी माँ!

अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ पाना सिखाती मेरी माँ
पर साथ ही मेरे लिए दुनिया से लड़ लेती मेरी माँ!

सदा मुझ पर स्नेह और आशीष बरसाती मेरी माँ,
मेरी बला और मेरे बीच में ढाल बनती मेरी माँ!

आज मैं सफल हूँ, सक्षम हूँ, संपन्न हूँ
पर फिर भी हूँ अधूरी
क्योंकि मेरे पास अब नहीं है ... मेरी माँ.

Friday, 8 April 2016

रेहने दो, तुम नहीं समझोगे।


टीस सी उठती है दिल में,
काँटे चुभते हैं।
नज़र नहीं आते
पर चुभते हैं।
रेहने दो, तुम नहीं समझोगे।

सीने में जलन होती है
धुआँ सा उठता है।
नज़र नहीं आता
पर उठता है।
रेहने दो, तुम नहीं समझोगे।

एक पीड़ा चीर देती है
खून बेहता है।
नज़र नहीं आता
पर बेहता है।
रेहने दो, तुम नहीं समझोगे।

एकांत होता है।
मैं रोती रेहती हूँ।
आँसू नज़र नहीं आते
पर मैं रोती रेहती हूँ।
रेहने दो, तुम नहीं समझोगे।

मुझे अपने गले लगा लो
थोड़ा आराम मिल जायेगा
ज़ख्म पर मरहम सा लग जायेगा।
पर
रेहने दो, तुम नहीं समझोगे।