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Sunday, 9 October 2016

बातें


एक मेला सा था जैसे
जहाँ हम दोनों पहले मिले.
जान पहचान बढ़ी.
दो बातें तुमने लिखी,
दो बातें मैंने भी लिखी
जो तुमने पढ़ी.

कुछ आप-बीती,
कुछ शौक और पसंद,
कुछ काफिये और शायरी
जो तुमने मुझे लिखी,
जो मैंने भी लिखी
और तुमने पढ़ी.

इन बातों में न जाने कब
प्यार दबे पाँव चला आया
उन बातों में अब कशिश आ गई
जो तुमने मुझे लिखी,
जो मैंने तुम्हे लिखी
और तुमने पढ़ी.

अब तो रात भर जागते रहते
एहसास और अरमानो को भी जगाते रहते
दिल लुभाती थी वे बातें
जो तुमने मुझे लिखी,
जो मैंने तुम्हे लिखी
और तुमने पढ़ी.

मगर वक़्त बीतते
न जाने क्या हुआ ...
शायद नशा ही था
जो हौले हौले उतर गया.
और यूँही कम होने लगी वह बातें
जो तुमने मुझे लिखी,
जो मैंने तुम्हे लिखी
और तुमने पढ़ी.

तुम मसरूफ रहने लगे
मैंने भी बहाने बना लिए
दुआ-सलाम तक रह गई वह बातें
जो तुमने मुझे लिखी,
जो मैंने तुम्हे लिखी
और तुमने पढ़ी.

फिर जाना कि
तुम्हारी वह बातें तो अब भी होती हैं,
बस किसी ओर से
मुझसे नहीं.

मैं शिकायत भी क्या करती
क्योंकि हम दोनों ने लिखी थी जो बातें
वह तुमने तो सिर्फ पढ़ी थी
पर

मैंने महसूस की थी.

Saturday, 23 July 2016

Spaghetti


सैंडविच जैसी खिड़की से बाहर देखा
आम जैसा सूरज चमक रहा था.
परदे बंद किए,
देर हो चली, अब ऑफिस चलें.
निम्बू की कतली जैसे गाडी के पहिए
गाडी बेचारी ऑफिस तक न पहुँच सकी,
बिगड़ गई.
कुकुरमुत्ता जैसा अपना छाता खोला
और ऑफिस की ओर चलना पड़ा.
स्ट्रॉबेरी जैसी लाल नाक हो गई मेरी ...
उफ़! यह सर्दी!
सोचा एक प्याली गरम चाय पी लूँ.
टपरीवाले ने मुस्कुराते हुए पुछा
"आधा कप लेंगी या पूरा?"
उसकी मुस्कान से मक्कई के दाने जैसे
उसके दांत झलक रहे थे.
चाय का खयाल छोड़ दिया
कुछ आगे चली.
भुट्टा जो खाना था.
भुट्टे वाले के ककड़ी जैसे हाथ ...
उनसे भुट्टे सेके जा रहा था.
मुझे दिया, मैं आगे बढ़ी.
एक छोटी बच्ची पास आई.
जैतून जैसी उसकी आँखों में रस था.
नहीं रस नहीं ... शायद आंसू थे.
"भूख लगी है मेमसाब".
भुट्टा उसको ही दे दिया.
आगे बढ़ी, पार्क की तरफ चली.
बच्चे पार्क में क्रिकेट खेल रहे थे ...
टमाटर सी क्रिकेट बॉल उनकी.
आलू जैसा एक आदमी दौड़े जा रहा था.
दौड़ते दौड़ते आलू शायद छोटा हो जाए.
बेंच पर बैठ गई ...
आज ऑफिस नहीं जाना.
बेंच पर आ बैठी एक औरत
गोद में नन्हा शिशु लिए.
मूंगफली के दानों जैसे 
पदज उस शिशु के.
मैं मूंगफली खाने आगे चली.
काफी कुछ आगे चली ...
समुन्दर किनारे आ पहुंची.
मूंगफली वाली से कहा
"दस रूपये के शिशु पदज दो".
दो मिर्ची जैसे लाल होंठ उसके,
मुंह बनाते हुए बोली
"ठीक ठीक बोलिए न मेमसाब".
ठीक ठीक बोल कर
मूंगफली लिए मैं आगे चली.
सुबह का आम शाम होते ही
संतरा बन गया.
बेचारा पानी में डूब जायेगा ...
यह सोच कर उससे बचाने चली.
एक सेब जैसी औरत से टकरा गई.
"देख कर चलिए" कह कर
वह अनदेखा कर चली.
हाथों में मूंगफली,
सामने संतरा ओर
सेब आगे चला जा रहा था.
मैं समुन्दर की ओर बढ़ी.
तब वह आया, मेरा हाथ पकड़ा
और कहा "चलो यहाँ से चलते हैं".
पहली बार इंसान जैसा इंसान ही दिखा.
हम दोनों हाथों में हाथ लिए आगे चले.
अलबत्ता संतरा तो डूब गया
मगर आकाश में

एक इडली छोड़ता गया.


Sunday, 19 June 2016

एक वृक्ष

जीवन की धरा पर एक वृक्ष
महान, विशाल और घनिष्ठ.
उसकी शाखाओं पर रस्सी डाल कर
मैं झूला झूली,
लुक्का-छुपी खेलते
जब हम भाई-बहन सब
अक्सर उस वृक्ष के पीछे
मैं छिप जाती.

तेज़ धुप और झुलसती गर्मी में
वह वृक्ष शीतल छाँव देता.
अपनी विशाल छाया से जैसे
मेरे सर पर अपना हाथ रखता.

बारिश में उस वृक्ष का आश्रय लेती,
वह मुझे भीगने नहीं देता.
मुझ पर बूँदें गिरे
उससे पहले वह खुद
उन्हें झेल लेता.

ठिठुरती कंपकंपाती ठंड में
वह अपनी सूखी टहनियाँ देता ...
"इससे आग जला लो"
वह मेरा कितना खयाल रखता.

मैं जब कभी निराश हो जाती,
हार जाती ...
उस वृक्ष के तने का आधार लिए
मैं बैठ जाती.
वह मुझे कितना सहारा देता.

चलते चलते जब थक जाती
उस वृक्ष की शरण में
मैं सोने चली जाती ...
वह अपनी नरम पत्तियां झाड़ देता
मेरे लिए जैसे एक बिछौना बना देता.
वह मुझे बड़ा आराम देता.

एक दिन आया
वह वृक्ष नहीं रहा.
दोस्तों, मेरे पिता जैसा वृक्ष

इस जग में कोई और न होगा.

Thursday, 9 June 2016

क्या कहूं?


"अब हम अलग हो जाते हैं,
मैं आज के बाद तुमसे नहीं मिलना चाहता".
इतना कह कर दामन छोड़ दिया तुमने.
आज मुद्दत बाद इस मेहफ़िल में नज़र आये हो.
यह मेरे पैरों तले ज़मीन कहाँ चली गई?
मैं काँच के टुकड़ों पर हूँ खड़ी.

कुछ भी तो नहीं बदला तुम में
- हर बात, हर अंदाज़ वही है.
होठों पर ज़र्द सा दाग,
गाल पर बड़ा सा काला तिल,
बातें करते वक़्त हाथों से इशारे करते रहना ...
कुछ भी तो नहीं बदला तुम में
- हर बात, हर अंदाज़ वही है.
यह मेरी आँखों में तिनको जैसा क्या चुभने लगा है?

और फिर तुम्हारी नज़र मुझ पर पड़ी.
बात करूँ या न करूँ?’
- उलझन तुम्हारे चेहरे पर झलक रही है.
पास आकर पूछ तो लिया
"कैसी हो?"
अरे पगले! इतना भी नहीं जानते?

मुर्दे बोल नहीं पाते.

Saturday, 4 June 2016

यह शब्द तुम्हारे ...



कब से बैठी हूँ
पास तुम्हारे,
तुम्हे शब्दों के सिवाय
कुछ दिखता ही नहीं.
मैं भी नहीं.

कितना प्यार है तुम्हे
अपने इन शब्दों से,
शब्दों से बनती
अपनी कविता से.

मैं कँगन खनकाती हूँ,
पुराने किसी गाने की धुन
गुनगुनाती हूँ.
पर तुम तो हर पल
अपने शब्दों को ही सहलाते हो,
उन्हें ही चूमते रहते हो.
उन्हें ही गले लगाते हो.

शायद मैं ही
झूठी आस लिए बैठी हूँ
कि तुम अब मेरी तरफ देखोगे.
पर तुम तो जैसे
मेरे होने से ही अंजान हो.

अब यह आस चुभने लगी है.
मुझे तुम्हारे पास
बैठने नहीं दे रही है.
मेरा चला जाना ही अच्छा होगा.
तुम्हे तो वैसे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

उठ कर दरवाज़े तक चली,
चौखट पर पैर ही रखा
कि तुम्हारी कविता से शब्द
दौड़े चले आए
और मेरे गले लग गए!

Wednesday, 1 June 2016

यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं


आज-कल यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.
न वक़्त देखते हैं
न अवसर देखते हैं,
हर पल हर जगह
बस उनकी ही बातों के लिए चले आते हैं.
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.

कितना डराती हूँ
कितना धमकाती हूँ.
"दुनिया क्या कहेगी? लोग क्या सोचेंगे?"
बार-बार यह बात समझाती हूँ.
पर शब्द उनकी ही बातों के लिए चले आते हैं.
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.

कौशल्या के राम होते तो वनवास भेज देती,
जशोदा के कान्हा होते तो इन्हें किसी पेड़ से बाँध देती.
मगर यह शब्द तो अंजनी-पुत्र जैसे हैं -
यहाँ से वहाँ
इधर से उधर भागते रहते हैं.
और उनकी ही बातों के लिए चले आते हैं.
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं.

सोचा इन शब्दों को सबक सिखाऊँ.
मुंह से कुछ न बोलूं
उन्हें बाहर ही निकलने न दूँ.
कलम की स्याही में क़ैद कर दूँ
मैं कुछ भी न लिखूं.
क्योंकि
यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं

मगर फिर मेरे यह शब्द रोने लगे.
घुट-घुट के जैसे मरने लगे.
मुझे उन पर तरस आया
और उनसे पुछा -
'क्यों हर पल उनकी ही बातों के लिए चले आते हो?
क्यों मेरा कहना नहीं मानते हो?'

शब्दों ने भी क्या खूब जवाब दिया -
'जब देखो तब हमें डांटती रहती हो.
उनके ख्यालों में जो खोया रहता है
अपने उस मन से तो कुछ नहीं कहती हो.'
उफ़!

आज-कल यह शब्द मेरे बड़े शरारती हो गए हैं ...

Saturday, 14 May 2016

मैं क्या करूँ?


एक काली उदास रात को
गहरी नींद की गिरफ़्त में थी मैं
ऐसे में वह मेरे सपनों में आया.
यूँ रुला भी गया, यूँ मना भी गया.
मुझसे गले लग कर मेरे आंसू पोंछता भी गया.
भीगी आँखें थी मेरी जब मैं जागी
इस कदर वह सपने को वास्तविकता में बदलता गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उससे सपनों से आज़ाद कर दूँ,
हकीकत में ही उससे क्यों न ले आऊं?
पर वह इस बात से अंजान
मुझसे नाराज़ हो गया, बहुत दूर हो गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उसकी मूर्ति ही बना लूँ.
मिटटी, पानी और प्यार मिलाया,
उसकी काया को अपने हाथों से संवारा 
एक शिल्पकार का हुन्नर दिखाया.
मगर उस मूर्ति में जान आ गई
और वह वहां से चला गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उसकी तस्वीर ही बना लूँ.
अपने कमरे की एक दीवार पर
कई रंगों से, प्यार भरे वर्ण से
उसकी मोहक तस्वीर बनाई.
एक कलाकार का हुन्नर दिखाया.
मगर उस तस्वीर में जान आ गई
और वह वहां से चला गया.
अब मैं क्या करूँ?

सोचा उसके नाम का एक काव्य लिखूं.
अपने ह्रदय के शब्दकोष से शब्द चुने
और उसके वर्णन में कई पद रचे.
एक कवियत्री का हुन्नर दिखाया.
मगर उस काव्य में जान आ गई
और वह वहां से चला गया.
अब मैं क्या करूँ?

जो भी प्रयास करूँ
वह तो उठ कर चला जाता है.
उससे मनाने के लिए
अब मैं क्या करूँ?

फिर शांत चित्त से सोचा.
मेरे मन में एक महल बनाया.
महल में एक भूलभुलैया बनाई.
उससे फिर से अपने विचारों में ले आई
और उस भूलभुलैया के बीच छोड़ आई.
वह वहां से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहा है.
वह आज भी मेरे विचारों में क़ैद है.
अब कोई बताये कि

वह क्या करे?